लेखक: अजय वर्मा
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकपर्व छेरछेरा को धमतरी जिले में पूरे उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष तारिणी चंद्राकर ने बच्चों को धान और अन्य आवश्यक सामग्री दान कर छेरछेरा की प्राचीन परंपरा का पालन किया। उन्होंने अन्नदान के माध्यम से समाज में समानता, सहयोग और मानवीय संवेदना का संदेश दिया।

छेरछेरा पर्व का सांस्कृतिक महत्व
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो विशेष रूप से अन्नदान की परंपरा से जुड़ा हुआ है। इस दिन लोग अपने घरों में उपजे धान, साग-भाजी, अनाज और धन का एक हिस्सा जरूरतमंदों और बच्चों को दान करते हैं। यह पर्व नई फसल के आगमन और किसानों की मेहनत के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। गांव-गांव में बच्चे “छेरछेरा… छेरछेरा” कहते हुए घर-घर जाकर अन्न संग्रह करते हैं, जिसे लोग खुशी और श्रद्धा से दान करते हैं।
तारिणी चंद्राकर ने दिया सामाजिक संदेश
छेरछेरा पर्व के अवसर पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष तारिणी चंद्राकर ने कहा कि किसान अपनी मेहनत से उपजाई गई फसल का एक हिस्सा श्रद्धापूर्वक समाज के लिए दान करते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि अन्नदान समाज में समानता और सहयोग की भावना को मजबूत करता है और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।
अन्नदान: परंपरा से आगे एक विचार
तारिणी चंद्राकर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि छेरछेरा पर्व यह सिखाता है कि प्रकृति और परिश्रम से प्राप्त समृद्धि को समाज के साथ साझा करना ही सच्चा धर्म है। अन्नदान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि यह मानवीय मूल्यों, करुणा और आपसी सहयोग का प्रतीक है। इस पर्व के माध्यम से समाज में यह भावना विकसित होती है कि कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे।
गांवों में दिखी सांस्कृतिक छटा
धमतरी जिले के ग्रामीण इलाकों में छेरछेरा पर्व को आज भी पूरी पारंपरिक विधि और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। गांवों में लोकगीतों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक सहभागिता ने इस पर्व को और भी खास बना दिया। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी उत्साह के साथ इस आयोजन में शामिल हुए, जिससे सामाजिक एकता की भावना स्पष्ट रूप से देखने को मिली।
एकता और भाईचारे का पर्व
छेरछेरा केवल अन्नदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व समाज में भाईचारे, आपसी सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है। इस दिन लोग जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करते हैं। यही कारण है कि छेरछेरा को छत्तीसगढ़ की सामाजिक संस्कृति की आत्मा कहा जाता है।
परंपराओं को जीवित रखने की जरूरत
स्थानीय लोगों का मानना है कि छेरछेरा जैसे लोकपर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसे आयोजनों से बच्चों में सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों की समझ विकसित होती है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा इस परंपरा का पालन करना समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण माना जा रहा है।
डिस्क्लेमर: यह लेख स्थानीय कार्यक्रमों, सार्वजनिक बयानों और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार संबंधित व्यक्तियों के निजी वक्तव्यों पर आधारित हैं। लेख का उद्देश्य केवल सूचना और सांस्कृतिक जागरूकता प्रदान करना है।














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