लेखक: अजय वर्मा
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक अहम कानूनी मामले में झटका देते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है। यह मामला बेमेतरा जिले से जुड़ा हुआ था, जिसमें सरकार की ओर से अपील दायर करने में 65 दिनों की देरी हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और संतोषजनक कारण के इतनी लंबी देरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला
बेमेतरा जिले से संबंधित इस मामले में निचली अदालत या संबंधित प्राधिकरण द्वारा पहले ही एक निर्णय दिया जा चुका था। राज्य सरकार उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करना चाहती थी, लेकिन निर्धारित समय सीमा के भीतर याचिका दायर नहीं की जा सकी। इसके बाद सरकार ने देरी माफी (Delay Condonation) की अर्जी के साथ अपील प्रस्तुत की थी।
65 दिन की देरी पर अदालत सख्त
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने देरी के कारणों पर गंभीरता से विचार किया। अदालत ने कहा कि केवल प्रशासनिक प्रक्रिया या फाइलों के इधर-उधर घूमने को देरी का ठोस कारण नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि सरकारी पक्ष होने के कारण किसी को विशेष छूट नहीं दी जा सकती और कानून सभी के लिए समान है।
सरकार की दलीलें हुईं कमजोर
राज्य सरकार की ओर से पेश की गई दलीलों को अदालत संतोषजनक नहीं मान पाई। कोर्ट का मानना था कि सरकार के पास पर्याप्त समय और संसाधन होते हैं, इसके बावजूद यदि समयसीमा का पालन नहीं किया गया, तो इसके लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। इसी आधार पर देरी माफी की अर्जी को खारिज कर दिया गया।
याचिका खारिज होने का असर
हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद बेमेतरा मामले में निचली अदालत का फैसला प्रभावी बना रहेगा। इस निर्णय का असर भविष्य में ऐसे मामलों पर भी पड़ सकता है, जहां सरकारी विभाग समय पर अपील दायर करने में लापरवाही बरतते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकारी तंत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में समय-सीमा के महत्व को रेखांकित करता है। अदालतें अब देरी के मामलों में पहले से ज्यादा सख्त रुख अपना रही हैं, चाहे पक्षकार सरकार ही क्यों न हो। इससे न्यायिक व्यवस्था में अनुशासन और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा।
आगे की राह
इस फैसले के बाद राज्य सरकार के पास सीमित कानूनी विकल्प ही बचे हैं। सरकार चाहे तो उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ आगे की कानूनी प्रक्रिया पर विचार कर सकती है, लेकिन उसमें भी समय-सीमा और ठोस आधारों का विशेष ध्यान रखना होगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायिक जानकारी पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल सामान्य सूचना प्रदान करना है। किसी भी कानूनी निष्कर्ष या अंतिम निर्णय के लिए संबंधित न्यायालय के आधिकारिक आदेश को ही प्रामाणिक माना जाए।













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