4 दिसंबर 2025 — लेखक: Ajay Verma
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सड़कों पर बढ़ रहे हूलिगनिज्म (हाई-स्पीड स्टंट, जुलूस एवं सार्वजनिक स्थानों पर अवैध जश्न) और ट्रैफिक नियमों के खुले आम उल्लंघन पर गहरा असंतोष जताया है। सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने कहा कि अमीर और प्रभावशाली वर्ग के लोग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और प्रशासन की हिफाज़त देरी या ‘आंख बंद’ करने जैसी प्रतीत होती है।

कहां पर सबसे अधिक चिंता
कोर्ट ने विशेष रूप से राष्ट्रीय राजमार्गों और शहरी मुख्य मार्गों पर होने वाली स्टंटबाजी, कार-बाइक पर बैठकर खतरनाक करतब दिखाने और सार्वजनिक मार्गों पर आयोजित बड़े जमावड़ों की घटनाओं का उल्लेख किया। ये घटनाएँ न केवल ट्रैफिक अव्यवस्था पैदा कर रही हैं बल्कि आम नागरिकों की जान और संपत्ति के लिए सीधा खतरा बन रही हैं। न्यायालय ने कहा कि गाइडलाइनों का अस्तित्व तभी सार्थक है जब उनका कड़ाई से पालन हो।
प्रशासन पर सवाल-जवाब
बार-बार निर्देशों और सूचनाओं के बावजूद अगर सड़क सुरक्षा की स्थिति नहीं सुधरती तो यह शासन की जवाबदेही पर प्रश्न उठाता है। हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से शपथपत्र में विस्तृत कार्रवाई का ब्यौरा माँगा है और कहा है कि केवल आँकड़ों या रिपोर्टों से काम नहीं चलेगा — जमीन पर प्रभावी प्रवर्तन दिखाई देना चाहिए। पुलिस और स्थानीय प्रशासन से भी ठोस कदम अपेक्षित हैं, वरना न्यायालय सख्त आदेश जारी कर सकता है।
कठोर सजा और रोकथाम के कदम
न्यायालय ने सुझाव दिए हैं कि स्टंटबाजी और अवैध जुलूसों के मामलों में तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए, वाहनों को जब्त किया जाए और दोषियों के लाइसेंस निरस्त करने जैसे कड़े उपाय लागू किए जाएँ। साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो की भी जांच करके संगठित गैरकानूनी गतिविधियों की पहचान कर नेतृत्त्वकर्ता/प्रायोजकों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
नागरिक सुरक्षा प्राथमिकता बनें
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए और किसी भी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के कारण नियमों के पालन में ढील नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय ने आग्रह किया है कि राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन त्वरित, पारदर्शी तथा सुसंगत कदम उठाएँ ताकि आम नागरिक सुरक्षित महसूस कर सकें।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की फटकार एक चेतावनी है — सिर्फ नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं, उनका निष्पादन और जवाबदेही जरूरी है। अगर शासन तथा प्रवर्तन एजेंसियाँ समय रहते ठोस कदम नहीं उठातीं, तो न्यायालय द्वारा और भी सख्त निर्देश और पर्यवेक्षण की सम्भावना दिखाई देती है। अब यह देखना होगा कि राज्य प्रशासन कोर्ट के आदेशों पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है और सड़क सुरक्षा के लिए कितनी असरदार योजना लागू होती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक सूत्रों और निचली दर्जे की रिपोर्टिंग के आधार पर तैयार किया गया है। समाचार की वास्तविकता और आधिकारिक बयानों के लिए संबंधित सरकारी और न्यायालयीय स्रोतों की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति देखें। इस लेख का उद्देश्य जानकारी प्रदान करना है न कि किसी पक्ष अथवा व्यक्ति के ख़िलाफ़ निर्णय देना।











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