लेखक: Ajay Verma | तारीख: 25 अक्टूबर 2025 | स्थान: बिलासपुर, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि 7 साल से गुमशुदा सरकारी कर्मचारी की पत्नी अपने पति की नौकरी समाप्ति के खिलाफ चुनौती दे सकती है और उससे संबंधित सेवा लाभ प्राप्त करने की हकदार होगी। अदालत ने यह निर्णय मानवता और न्याय के सिद्धांतों के आधार पर सुनाया है।

मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक ऐसे सरकारी कर्मचारी से जुड़ा है जो सात साल पहले अचानक लापता हो गया था। उसके परिवार ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन लंबे समय तक कोई सुराग नहीं मिला। इस बीच विभाग ने नियमों के तहत उसकी सेवा समाप्त कर दी।
कर्मचारी की पत्नी ने विभागीय आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति की मृत्यु की कानूनी घोषणा नहीं होती, तब तक उसकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती और परिवार को उसके सेवा लाभ (जैसे पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सुविधाएँ) से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का निर्णय
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सात वर्ष या उससे अधिक समय तक लापता रहता है और उसका कोई पता नहीं चलता, तो उसे “मृत मानने” का अनुमान लगाया जा सकता है।
अदालत ने माना कि विभाग ने बिना उचित प्रक्रिया के नौकरी समाप्त कर दी, जो विधिक दृष्टि से अनुचित है। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि वह कर्मचारी की पत्नी को सभी बकाया सेवा लाभ, पेंशन और अन्य अधिकार तुरंत प्रदान करे।
फैसले का महत्व
यह फैसला उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जिनके सदस्य सरकारी सेवा में रहते हुए लापता हो जाते हैं। ऐसे मामलों में प्रायः परिवार आर्थिक और कानूनी दोनों संकटों से जूझता है। हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि विभागों को मानवता और कानून दोनों का संतुलन बनाए रखना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश भविष्य में ऐसे कई मामलों में नजीर (precedent) बनेगा, और इससे अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि गुमशुदा कर्मचारियों के परिवारों के साथ अन्याय न हो।
राज्य सरकार की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार ने अदालत के आदेश का सम्मान करते हुए कहा कि वह फैसले के अनुरूप कार्रवाई करेगी। संबंधित विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि याचिकाकर्ता को शीघ्र सेवा लाभ जारी किए जाएँ। साथ ही, गुमशुदा कर्मचारियों के मामलों की समीक्षा के लिए विशेष समिति गठित करने पर भी विचार किया जा रहा है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल विधिक दृष्टि से बल्कि मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उन परिवारों के अधिकारों की रक्षा करता है जिनके प्रियजन लापता हो जाते हैं। यह निर्णय न्यायपालिका की संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल प्रस्तुत करता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख समाचार रिपोर्टों और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। प्रस्तुत जानकारी केवल सूचना के उद्देश्य से दी गई है। किसी भी तथ्यात्मक त्रुटि या परिवर्तन के लिए लेखक या वेबसाइट जिम्मेदार नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि वे किसी भी कानूनी या आधिकारिक पुष्टि के लिए संबंधित विभाग या न्यायालय की वेबसाइट देखें।
लेखक: Ajay Verma











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