दिनांक: 27 दिसंबर 2025
लेखक: Ajay Verma
छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ अपनी रणनीति में एक बड़ा और निर्णायक बदलाव करने के संकेत दिए हैं। राज्य में वर्षों से लागू माओवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) नीति को लेकर अब सरकार का रुख पहले से कहीं अधिक सख्त होता नजर आ रहा है। सूत्रों के अनुसार, सरकार जनवरी 2026 के अंत तक नक्सल रिहैब सुविधाओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

अब तक कैसी थी नक्सल रिहैब नीति
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के आत्मसमर्पण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वर्षों पहले पुनर्वास नीति लागू की थी। इसके तहत हथियार छोड़ने वाले माओवादियों को नकद सहायता, रोजगार, कौशल प्रशिक्षण, आवास और सामाजिक पुनर्वास जैसी सुविधाएं दी जाती थीं। इसका उद्देश्य हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने के लिए उन्हें प्रेरित करना था।
नीति में बदलाव की वजह क्या है
सरकारी आकलन में यह बात सामने आई है कि कई मामलों में रिहैब नीति का दुरुपयोग हुआ है। कुछ नक्सली पुनर्वास का लाभ लेने के बाद दोबारा नक्सली गतिविधियों में शामिल पाए गए। इसके अलावा, सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नक्सल संगठन अब इस नीति को रणनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं।
सरकार का नया फोकस: कड़ा सुरक्षा ऑपरेशन
नई रणनीति के तहत सरकार अब पुनर्वास से ज्यादा कठोर सुरक्षा कार्रवाई पर जोर देना चाहती है। डीआरजी, सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन जैसे बलों को और अधिक मजबूत किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि सख्त ऑपरेशन और विकास कार्यों के संयोजन से ही नक्सलवाद की जड़ें पूरी तरह खत्म की जा सकती हैं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि रिहैब नीति खत्म होने से आत्मसमर्पण की संख्या घट सकती है, जबकि दूसरा पक्ष इसे सुरक्षा बलों के मनोबल को मजबूत करने वाला कदम बता रहा है।
आने वाले समय में क्या असर पड़ेगा
यदि सरकार रिहैब नीति को पूरी तरह समाप्त करती है, तो यह छत्तीसगढ़ की नक्सल विरोधी रणनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि, इसके प्रभाव का वास्तविक आकलन आने वाले वर्षों में ही संभव होगा। सरकार के लिए यह संतुलन बनाना जरूरी होगा कि सुरक्षा के साथ-साथ आदिवासी इलाकों का विकास भी प्रभावित न हो।
डिस्क्लेमर:
यह लेख विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स, सरकारी संकेतों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। किसी भी नीति संबंधी अंतिम निर्णय के लिए संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं और आधिकारिक बयानों को ही मान्य माना जाए।











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